भारत का 6G रोडमैप तेज: NFAP-2025 के बाद 5G-Advanced और 6G के लिए 6GHz स्पेक्ट्रम पर बड़ा संकेत
भारत के टेलीकॉम सेक्टर में 2026 की शुरुआत में स्पेक्ट्रम रणनीति को लेकर सबसे बड़ी चर्चा National Frequency Allocation Plan 2025 (NFAP-2025) के बाद तेज हो गई है। 17 जनवरी 2026 को टेलीकॉम इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा ट्रेंडिंग विषयों में 6GHz बैंड और 6G/IMT-2030 से जुड़ी स्पेक्ट्रम प्लानिंग प्रमुख रही।
विशेषज्ञ मानते हैं कि NFAP-2025 के जरिए सरकार ने संकेत दे दिया है कि आने वाले वर्षों में 5G-Advanced और 6G की नींव “मिड-बैंड” स्पेक्ट्रम की उपलब्धता पर रखी जाएगी, जिसमें 6GHz बैंड निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
NFAP-2025 क्या है और क्यों अहम है?
NFAP-2025 एक ऐसा आधिकारिक दस्तावेज है जो यह तय करता है कि किस तरह के रेडियो-फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम को किन रेडियो-कम्युनिकेशन सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह स्पेक्ट्रम मैनेजमेंट का “ब्लूप्रिंट” माना जाता है।
NFAP-2025 के लागू होने के बाद स्पेक्ट्रम प्लानिंग में कुछ खास बदलाव सामने आए हैं, जिनका असर सीधे टेलीकॉम ऑपरेटर, डिवाइस इकोसिस्टम और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा।
6GHz बैंड पर फोकस क्यों बढ़ा?
5G नेटवर्क की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि “लो-बैंड” कवरेज तो देता है, लेकिन स्पीड और कैपेसिटी सीमित होती है। वहीं “mmWave” में स्पीड बहुत ज्यादा है, लेकिन कवरेज कम और लागत ज्यादा।
इसी वजह से “मिड-बैंड स्पेक्ट्रम” सबसे उपयोगी माना जाता है। 6GHz बैंड इसी मिड-बैंड कैटेगरी में आता है और दुनिया भर में इसे लेकर बड़ी रणनीतिक खींचतान चल रही है।
6GHz बैंड से क्या फायदा?
- बेहतर स्पीड और कम लैटेंसी (5G-Advanced के लिए जरूरी)
- शहरों में हाई-कैपेसिटी नेटवर्क डिप्लॉयमेंट आसान
- 6G (IMT-2030) की तैयारी के लिए टेक्नोलॉजिकल बेस
- एंटरप्राइज और इंडस्ट्रियल 5G में नई संभावनाएं
IMT क्या होता है और इसका 6G से क्या संबंध?
IMT का मतलब है International Mobile Telecommunications। यही वह टेक्नोलॉजी फ्रेमवर्क है जिसके तहत 3G, 4G, 5G को वैश्विक रूप से मान्यता मिली।
6G को अक्सर IMT-2030 कहा जा रहा है। यानी 2030 के आसपास 6G स्टैंडर्ड व्यावहारिक रोलआउट में आ सकता है। NFAP-2025 के बाद भारत की स्पेक्ट्रम प्लानिंग इसी दिशा में जाती दिख रही है।
NFAP-2025 के बाद “Spectrum Roadmap” क्यों ट्रेंड कर रहा है?
17 जनवरी 2026 के आसपास इंडस्ट्री में यह चर्चा तेज रही कि NFAP-2025 ने कई बैंड्स में नए allocation संकेत दिए हैं। इससे टेलीकॉम कंपनियों को यह समझ आने लगा है कि भविष्य में किस तरह का नेटवर्क निवेश करना होगा।
टेलीकॉम सेक्टर में रोडमैप का मतलब केवल “कौन सा बैंड मिलेगा” नहीं होता, बल्कि:
- कैपेक्स प्लानिंग (टावर, फाइबर, रेडियो यूनिट)
- डिवाइस इकोसिस्टम (चिपसेट/फोन/IoT)
- नेटवर्क मॉडर्नाइजेशन (5G-SA, slicing)
- नीलामी/लाइसेंसिंग रणनीति
भारत के लिए 6G की तैयारी: रणनीति का बड़ा मतलब
भारत पहले ही 5G adoption में तेज़ी से आगे बढ़ चुका है। ऐसे में 6G की तैयारी “टेक्नोलॉजी leadership” का संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार 6G केवल मोबाइल इंटरनेट नहीं होगा, बल्कि:
- AI-native network (नेटवर्क खुद optimize करेगा)
- Hyper-connectivity (massive IoT)
- Ultra-low latency (remote surgery/industrial control)
- Integrated sensing & communication
टेलीकॉम कंपनियों के लिए इसका क्या असर होगा?
NFAP-2025 के बाद ऑपरेटरों पर सबसे बड़ा दबाव होगा कि वे 5G को केवल “rollout” से आगे बढ़ाकर monetization और quality में बदलें। 6GHz जैसे बैंड्स के संकेत मिलने से कंपनियां अपने future network design को नए तरीके से सोच सकती हैं।
ऑपरेटरों के लिए 3 प्रमुख implications
- Network densification बढ़ेगा (साइट्स/स्मॉल सेल्स)
- Backhaul demand बढ़ेगी (fiber + microwave)
- Enterprise 5G के लिए नई pricing models
2026 में आगे क्या देखने को मिलेगा?
टेलीकॉम सेक्टर में 2026 के भीतर स्पेक्ट्रम प्लानिंग से जुड़े कुछ बड़े कदम संभव हैं:
- 6GHz को लेकर consultation/strategy clarification
- 5G-Advanced readiness and network upgrades
- device ecosystem alignment (भारत में 6GHz enabled devices)
- नई spectrum assignment policies (industry feedback के साथ)
निष्कर्ष
NFAP-2025 के बाद भारत की स्पेक्ट्रम नीति ने यह साफ कर दिया है कि 2026 केवल 5G rollout का साल नहीं रहेगा, बल्कि 5G-Advanced और 6G preparation का turning point बनने जा रहा है। 6GHz जैसे मिड-बैंड्स की दिशा में कदम टेलीकॉम सेक्टर को लंबे समय के लिए नई गति दे सकते हैं।























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